2020–21 का किसान आंदोलन अभी भी लोगों की यादों में ताजा है, जब दिल्ली की सीमाओं पर महीनों तक ट्रैक्टरों की कतारें दिखती रहीं। हाल के घटनाक्रमों को देखें तो संकेत मिल रहे हैं कि किसानों का असंतोष एक बार फिर सामने आ रहा है। इस बार मुद्दे सिर्फ न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तक सीमित नहीं हैं, बल्कि खाद की उपलब्धता और कीमतें भी किसानों की चिंता का बड़ा कारण बन गई हैं।

दिसंबर के आखिरी हफ्ते में देश के कई हिस्सों में किसानों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। अलग-अलग राज्यों से मिल रही रिपोर्टों के मुताबिक, ये आंदोलन धीरे-धीरे व्यापक रूप ले सकते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इस बार किसानों की मुख्य मांगें क्या हैं और सरकार का रुख इन्हें लेकर क्या रहने वाला है।
किसान आंदोलन की नई लहर क्यों?
मध्य प्रदेश के धार, खरगोन, बड़वानी और खंडवा जिलों में नेशनल हाईवे-52 के खलघाट टोल प्लाजा पर किसानों ने दिसंबर की शुरुआत में चक्का जाम किया। यह प्रदर्शन राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के नेतृत्व में हुआ, जिसमें MSP की कानूनी गारंटी, कर्जमाफी और फसल खरीदी सुनिश्चित करने जैसी मांगें सामने रखी गईं। कई किसान संगठनों का कहना है कि MSP की घोषणा तो होती है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर उस दर पर खरीद सीमित रह जाती है। इसी वजह से किसानों को बाजार में कम दाम पर फसल बेचने की मजबूरी झेलनी पड़ती है।
महाराष्ट्र के बीड जिले में भी किसानों ने कपास और तुअर के लिए 12,000 रुपये प्रति क्विंटल तथा सोयाबीन के लिए 7,000 रुपये प्रति क्विंटल MSP की मांग रखी है। अन्नपूर्णा समिट 2025 में किसान नेताओं वी.एम. सिंह और राजू शेट्टी ने कहा कि पिछले लगभग दस वर्षों में खेती की लागत में तेज़ बढ़ोतरी हुई है, जबकि फसलों की कीमतों में उसी अनुपात में इजाफा नहीं हुआ।
खाद की कमी और कालाबाजारी का सच
सरकार ने रबी सीजन 2025-26 के लिए लगभग 37,952 करोड़ रुपये की खाद सब्सिडी का ऐलान किया था। फॉस्फेट और पोटाशिक खादों पर सब्सिडी बढ़ाने का उद्देश्य यह बताया गया कि किसानों को DAP और यूरिया सस्ते दामों पर मिल सके। हालांकि, कई राज्यों से आ रही जमीनी रिपोर्टें इससे अलग तस्वीर पेश करती हैं। हरियाणा के फरीदाबाद समेत कुछ इलाकों में किसानों का आरोप है कि उन्हें सरकारी दरों पर खाद नहीं मिल पा रही, जबकि निजी स्तर पर वही खाद 1,650 से 2,000 रुपये तक में बेची जा रही है।
मेरठ में किसानों ने कृषि निदेशालय के सामने प्रदर्शन करते हुए सब्सिडी वितरण में गड़बड़ी के आरोप लगाए। किसान संगठनों का कहना है कि कहीं-कहीं कागजी प्रक्रियाओं और आपूर्ति व्यवस्था की खामियों के कारण सब्सिडी का लाभ समय पर सही किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
क्या फिर दोहराई जाएगी 2020 जैसी स्थिति?
किसान नेताओं सरवन सिंह पंढेर और जगजीत सिंह डल्लेवाल सहित कई संगठनों ने संकेत दिए हैं कि यदि बातचीत आगे नहीं बढ़ी, तो आंदोलन का दायरा बढ़ सकता है। संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि 2021 में केंद्र सरकार द्वारा दिए गए कुछ लिखित आश्वासन अब तक पूरी तरह लागू नहीं हुए हैं।
संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) से जुड़े संगठनों ने ट्रैक्टर मार्च, महारैली और अन्य कार्यक्रमों की रूपरेखा भी तैयार की है। 26 नवंबर 2025 को किसान आंदोलन की पांचवीं वर्षगांठ पर देशभर में एकजुट कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिससे यह संकेत मिला कि विभिन्न किसान संगठन आपसी समन्वय की कोशिश कर रहे हैं।
सरकार का रुख और किसानों की उम्मीदें
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पहले किसानों से बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की थी। वहीं कुछ किसान संगठनों का कहना है कि वार्ता प्रक्रिया में सभी संबंधित पक्षों को शामिल नहीं किया गया, जिससे असंतोष बना हुआ है। मध्य प्रदेश में प्रदर्शन कर रहे किसान यूनियनों का कहना है कि यदि सरकार ठोस बातचीत के लिए तैयार होती है, तो वे भी समाधान की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
किसानों ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपकर अपनी मांगें रखी हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हाल के वर्षों में कुछ फसलों के MSP में बढ़ोतरी की गई है। उदाहरण के तौर पर सोयाबीन के MSP में 8.9% की वृद्धि कर इसे 5,328 रुपये प्रति क्विंटल किया गया। हालांकि किसान संगठनों का कहना है कि यह बढ़ोतरी मौजूदा लागत के मुकाबले पर्याप्त नहीं है।
अब आगे क्या हो सकता है?
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यदि MSP पर कानूनी स्पष्टता और खाद वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं आई, तो असंतोष बढ़ सकता है। कई रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि दिसंबर के अंत या जनवरी की शुरुआत में देशव्यापी आंदोलन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और किसान संगठनों के बीच समय रहते संवाद होने से स्थिति को संभाला जा सकता है। सवाल यही है कि क्या इस बार दोनों पक्ष समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाते हैं, या फिर टकराव की स्थिति गहराती है।
आम सवाल-जवाब
Q.किसान इस बार सड़कों पर क्यों उतर रहे हैं?
किसान संगठन MSP की कानूनी गारंटी, कर्जमाफी, खाद की कालाबाजारी रोकने और फसल खरीदी व्यवस्था को मजबूत करने की मांग कर रहे हैं।
Q. खाद सब्सिडी के बाद भी किसानों को खाद क्यों नहीं मिल पा रही?
सरकारी सब्सिडी के बावजूद कुछ क्षेत्रों में आपूर्ति, वितरण और कालाबाजारी की शिकायतें सामने आ रही हैं, जिससे किसानों को निर्धारित दरों पर खाद नहीं मिल पा रही।
Q. क्या फिर से बड़ा किसान आंदोलन हो सकता है?
कई किसान संगठन बड़े स्तर पर आंदोलन की संभावना जता रहे हैं। अगर बातचीत आगे नहीं बढ़ी, तो आने वाले हफ्तों में विरोध प्रदर्शन तेज हो सकते हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह लेख केवल जानकारी और सार्वजनिक घटनाओं के विश्लेषण के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारियां विभिन्न समाचार रिपोर्टों, किसान संगठनों के बयानों और सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित हैं। किसी भी निष्कर्ष या निर्णय से पहले आधिकारिक सरकारी घोषणाओं की पुष्टि करना आवश्यक है।












